आयुर्वेद का 15 हजार करोड़ का कारोबार
28/01/2026
उत्तराखंड में आयुर्वेद का कारोबार 14 से 15 हजार करोड़ से अधिक का है। इसमें सबसे बड़ा योगदान पंतजलि जैसी बड़ी कंपनियों का है। राज्य में 250 के करीब आयुर्वेद की दवा निर्माण यूनिट हैं, जहां से पूरी दुनिया में आयुर्वेद के उत्पाद भेजे जाते हैं। दो साल पहले राज्य में आयोजित किए गए इंवेस्टर्स समित के दौरान भी 12 हजार करोड़ से अधिक के निवेश प्रस्ताव राज्य में आए थे। ऐसे में यदि आयुर्वेदिक दवाओं के लिए लाइसेंस की व्यवस्था बनती है तो इससे युवाओं के लिए रोजगार के रास्ते खुल सकते हैं।
आयुर्वेद दवा बिक्री के लिए लाइसेंस अनिवार्य करने का प्रस्ताव परिषद की ओर से शासन को भेजा गया है। इस संदर्भ में जल्द निर्णय होने की उम्मीद है। नए मानकों के लागू होने के बाद प्रशिक्षित फार्मासिस्टों को लाभ मिलेगा और दवाओं की बिक्री भी नियंत्रित हो सकेगी।
–नर्वदा गुसाईं, रजिस्ट्रार, भारतीय चिकित्सा परिषद
देहरादून, मुख्य संवाददाता। उत्तराखंड में आयुर्वेदिक दवाओं के लिए भी लाइसेंस अनिवार्य होने जा रहा है। भारतीय चिकित्सा परिषद उत्तराखंड की ओर से इस संदर्भ में शासन को प्रस्ताव भेजा गया है, जिस पर जल्द निर्णय होने की उम्मीद है।
दरअसल, आयुर्वेद और यूनानी दवाओं की बिक्री के लिए अभी लाइसेंस की जरूरत नहीं है। ऐसे में कोई भी दुकानदार या स्टोर संचालक इन दवाओं को बेच सकता है। लेकिन भारतीय चिकित्सा परिषद की उत्तराखंड शाखा ने मानकों में बदलाव का प्रस्ताव तैयार कर शासन को भेजा है। मंगलवार को इस संदर्भ में बैठक तय की गई थी। लेकिन ऐन वक्त पर सचिव आयुष के पदभार में हुए बदलाव की वजह से बैठक टल गई है। लेकिन शासन के सूत्रों ने बताया कि नए सचिव आयुष जल्द इस संदर्भ में बैठक कर नियमों में बदलाव के प्रस्ताव पर मुहर लगा सकते हैं।
आयुष के चार हजार फार्मासिस्टों को मिलेगा लाभ : आयुर्वेद दवाओं की बिक्री के संदर्भ में यदि मानकों में बदलाव हुआ तो इसका लाभ चार हजार से ज्यादा प्रशिक्षित फार्मासिस्टों को हो सकता है। चिकित्सा परिषद में चार हजार फार्मासिस्ट पंजीकृत हैं। जबकि राज्य में चार से पांच हजार आयुर्वेद दवा की दुकानें हैं। लाइसेंस अनिवार्य होने पर सभी दुकान व स्टोर संचालकों के लिए फार्मासिस्ट की तैनाती अनिवार्य होगी जिससे प्रशिक्षित बेरोजगारों को रोजगार मिलने का रास्ता साफ हो सकता है।

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