जसपुर। शहर-ए-मुफ्ती शमीम अख्तर सअदी ने कहा कि इस्लामी फलसफे में जकात एक ऐसा स्तंभ है जो मालदार और गरीब मुसलमान के बीच जज्बाती रिश्ता कायम करती है। जकात एक समाजवादी व्यवस्था है। इसे निकालते समय अपने गरीब रिश्तेदार या पड़ोसी को तरजीह देनी चाहिए ताकि आपके आसपास भी ईद की खुशियां मनाई जा सके। किसी गरीब का कर्ज उतारने में जकात का अहम रोल हो सकता है। जकात के जरिये कई लाइलाज बीमारियों से परेशान लोगों की मदद भी की जा सकती है। सबसे अहम फरीजा किसी गरीब की बेटी के हाथ पीले करना है। जकात की रकम फिजूलखर्ची में जाया न हो। यह भी एहतियात रखें कि सामान खुद लेकर जकात हासिल करने वाले के हाथ में दें। जकात तब तक पूरी नहीं मानी जाएगी जब तक आप जकात देने वाले के हाथ में देकर उसे मालिक न बना दें।
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हैसियतदार लोगों पर वाजिब है जकात
मुफ्ती शमीम अख्तर ने बताया कि कुरआन के मुताबिक जिस शख्स के पास 653 ग्राम 184 मिलीग्राम चांदी और 93 ग्राम 750 मिलीग्राम सोना या दोनों के बराबर नकद रुपये या तिजारत का सामान है, उस माल पर चांद की तारीख के हिसाब से एक साल गुजर गया हो तो उस शख्स पर ढाई फीसदी यानी एक लाख पर ढाई हजार रुपये जकात वाजिब है। जकात पर हर साल गुजरना शर्त है जबकि फितरे में साल गुजरना शर्त नहीं है। जकात बालिग और आकिल मुसलमान पर फर्ज है जबकि फितरा बच्चों की तरफ से अदा किया जा सकता

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