April 24, 2026

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बिजली निजीकरण के खिलाफ हड़ताल का ऐलान, कर्मचारियों ने सरकार को दी चेतावनी

देहरादून: देश में बिजली क्षेत्र के निजीकरण और इलेक्ट्रिसिटी संशोधन बिल 2025 के खिलाफ पावर सेक्टर से जुड़े अभियंताओ का आक्रोश बढ़ता दिख रहा है. खास बात यह है कि इसी विरोध के चलते हड़ताल की चेतावनी देने के साथ ही अभियंताओं ने सड़क पर उतरने की रूपरेखा भी तैयार की है. इसी के साथ उत्तराखंड में बिजली सेक्टर से जुड़ी जमीनों को अन्य विभागों को दिए जाने पर भी विरोध दर्ज कराया गया है.

लाइटनिंग एक्शन की दी चेतावनी: बिजली क्षेत्र के निजीकरण और इलेक्ट्रिसिटी संशोधन बिल 2025 के विरोध में देशभर के बिजली अभियंताओं और कर्मचारियों ने 12 फरवरी 2026 को राष्ट्रव्यापी हड़ताल का ऐलान किया है. ऑल इंडिया पावर इंजीनियर्स फेडरेशन (AIPEF) ने इस संबंध में केंद्रीय ऊर्जा मंत्री को औपचारिक नोटिस सौंपते हुए चेतावनी दी है कि यदि बजट सत्र के दौरान यह बिल संसद में पेश किया गया तो तत्काल लाइटनिंग एक्शन शुरू किया जाएगा. संगठन ने इसे सार्वजनिक बिजली क्षेत्र के अस्तित्व पर सीधा हमला बताया है.

AIPEF के चेयरमैन शैलेन्द्र दुबे ने कहा कि इलेक्ट्रिसिटी अमेंडमेंट बिल 2025 और प्रस्तावित राष्ट्रीय विद्युत नीति 2026 सस्ती और सुलभ बिजली व्यवस्था को कमजोर करने वाली हैं. उनका आरोप है कि इन नीतियों से सार्वजनिक स्वामित्व समाप्त होगा, संघीय ढांचे को नुकसान पहुंचेगा और राष्ट्रीय ऊर्जा सुरक्षा खतरे में पड़ जाएगी.

जमीनें बेचने का भी विरोध: उन्होंने कहा कि बिजली अभियंता और कर्मचारी लंबे समय से निजीकरण की नीतियों के खिलाफ संघर्ष कर रहे हैं, लेकिन सरकार लगातार उनकी चिंताओं की अनदेखी कर रही है. शैलेन्द्र दुबे ने उत्तराखंड सरकार द्वारा पावर सेक्टर की जमीनें बेचने और अन्य विभागों को हस्तांतरित करने के आदेश पर भी कड़ा विरोध दर्ज कराया.

सीएम धामी से की मांग: उन्होंने कहा कि इस फैसले से न केवल बिजली कर्मियों में, बल्कि व्यापारी, किसान, छात्र और आम जनता में भी भारी असंतोष है. AIPEF ने मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी से यह आदेश तत्काल वापस लेने की मांग की है और चेतावनी दी है कि यदि सरकार ने निर्णय नहीं बदला तो इसके खिलाफ व्यापक जन आंदोलन शुरू किया जाएगा, जिसकी पूरी जिम्मेदारी राज्य सरकार की होगी.
दरअसल, उत्तराखंड में पिछले कई दिनों से यमुना जल विद्युत परियोजना और लखवाड़ बांध परियोजना से जुड़ी जमीन को अन्य विभागों को सौंपे जाने के आदेश का कर्मचारी विरोध कर रहे हैं. इसी कड़ी में उत्तराखंड जल विद्युत निगम की डाक पत्थर परियोजना की जमीन को यूआईडीबी को हस्तांतरित किए जाने की चर्चा सामने आई थी. इसके बाद से ही कर्मचारियों और अभियंताओं में आक्रोश बढ़ता गया. अब इस मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर के आंदोलन से जोड़ दिया गया है.

आंदोलन का किया ऐलान: उधर AIPEF ने राष्ट्रीय रूप से बिजली क्षेत्र के निजीकरण को लेकर साफ किया है कि यदि संसद में इलेक्ट्रिसिटी अमेंडमेंट बिल 2025 पेश किया गया तो देशभर में बिजली अभियंता और कर्मचारी कार्यस्थल छोड़कर आंदोलन में शामिल होंगे. संगठन का कहना है कि वितरण क्षेत्र में मल्टी-लाइसेंसिंग व्यवस्था, जबरन स्मार्ट प्रीपेड मीटरिंग, ट्रांसमिशन सेक्टर में PPP और TBCB मॉडल, आउटसोर्सिंग और ठेका प्रथा से बिजली क्षेत्र अस्थिर हो रहा है.

निजीकरण मॉडल का विरोध: AIPEF ने चंडीगढ़ के बिजली निजीकरण मॉडल को पूरी तरह विफल बताते हुए उत्तर प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश में किए गए ऐसे ही प्रयोगों को लेकर भी गंभीर चेतावनी दी है. फेडरेशन की प्रमुख मांगों में इलेक्ट्रिसिटी (अमेंडमेंट) बिल 2025 और SHANTI Act 2025 को पूरी तरह वापस लेना, राष्ट्रीय विद्युत नीति 2026 को रद्द करना, बिजली निगमों के निजीकरण पर रोक, स्मार्ट प्रीपेड मीटरिंग समाप्त करना, संविदा कर्मियों का नियमितीकरण, रिक्त पदों पर स्थायी भर्ती और पुरानी पेंशन योजना की बहाली शामिल है.

AIPEF का कहना है कि इन मांगों की अनदेखी से बिजली व्यवस्था और कर्मचारियों दोनों का भविष्य संकट में पड़ जाएगा. शैलेन्द्र दुबे ने दो टूक कहा कि यदि सरकार संवाद का रास्ता नहीं अपनाती है और एकतरफा फैसले थोपती रही, तो आंदोलन और तेज किया जाएगा.

निजीकरण की नीति पर पुनर्विचार करें सरकार: उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि प्रस्तावित हड़ताल और आंदोलन के दौरान यदि बिजली आपूर्ति में किसी तरह का व्यवधान होता है तो इसकी पूरी जिम्मेदारी सरकार की होगी. AIPEF ने केंद्र और राज्य सरकारों से अपील की है कि वे निजीकरण की नीति पर पुनर्विचार करें और सार्वजनिक हित में बिजली क्षेत्र को मजबूत करने के लिए कर्मचारियों के साथ सार्थक बातचीत करें.

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