July 31, 2026

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शिक्षा के साथ संस्कार भी जरूरी, बेटियों को समय दें माता-पिता : उर्वशी दत्त बाली

काशीपुर। स्त्री की सबसे बड़ी शक्ति उसके संस्कार और उसकी मर्यादा हैं। वह चट्टानों से लड़कर अपने अधिकारों के लिए खड़ी हो सकती है और सम्मान की अधिकारी है, लेकिन मतभेद के नाम पर किसी के लिए अपमानजनक भाषा का प्रयोग करना नारी की गरिमा नहीं बढ़ाता।
काशीपुर की प्रथम महिला एवं समाजसेविका उर्वशी दत्त बाली ने हाल ही में सामने आए विवाद के संदर्भ में कहा कि इस पूरे घटनाक्रम ने समाज के सामने एक बेहद महत्वपूर्ण सवाल खड़ा किया है—क्या हम में से कुछ लोग सिर्फ अपनी बेटियों को केवल शिक्षा दे रहे हैं या उन्हें संस्कार, अनुशासन और सही दिशा देने के लिए पर्याप्त समय भी दे रहे हैं?
उर्वशी दत्त बाली ने कहा कि शिक्षा केवल डिग्री और किताबों तक सीमित नहीं होनी चाहिए। एक शिक्षित बेटी वही है जो अपने ज्ञान के साथ संयम, सम्मान, मर्यादा और राष्ट्र के प्रति जिम्मेदारी को भी समझे। देश के प्रधानमंत्री जैसे संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति के लिए यदि कोई सार्वजनिक रूप से बेहद अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल करता है, तो यह निश्चित रूप से सोचने का विषय है कि हमारी शिक्षा के साथ संस्कारों पर कितना ध्यान दिया जा रहा है।
उन्होंने कहा कि भारत की बेटियों के सामने प्रेरणा की कमी नहीं है। पी.टी. उषा, मैरी कॉम, पी.वी. सिंधु, साइना नेहवाल और मिताली राज ने खेलों के क्षेत्र में देश का गौरव बढ़ाया। किरण बेदी ने पुलिस सेवा में अपनी पहचान बनाई, वहीं गुंजन सक्सेना जैसी महिलाओं ने सेना में साहस और कर्तव्य की मिसाल पेश की। कल्पना चावला ने अंतरिक्ष के क्षेत्र में भारत की बेटियों के सपनों को नई उड़ान दी और टेसी थॉमस ने विज्ञान एवं रक्षा अनुसंधान के क्षेत्र में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया। चिकित्सा के क्षेत्र में डॉ. इंदिरा हिंदुजा जैसी महिलाओं ने देश को गौरवान्वित किया।
उर्वशी दत्त बाली ने कहा कुछ मां बाप जो अपनी बेटियों को समय नहीं दे पा रहे, माता-पिता अपनी बेटियों को इन महान महिलाओं की कहानियां सुनाएं। उन्हें केवल सफल बनने की नहीं, बल्कि एक मजबूत, आत्मनिर्भर, संस्कारी और जिम्मेदार महिला बनने की शिक्षा दें। सच में कुछ मां बाप के लिए बहुत जरूरी है कि बेटियों को समय दें, उनसे संवाद करें और उन्हें सही-गलत का फर्क समझाएं।”
उन्होंने कहा कि असहमति लोकतंत्र की खूबसूरती है, हर व्यक्ति को अपनी बात रखने का अधिकार है, लेकिन अपनी बात रखने का तरीका भी हमारी शिक्षा और संस्कारों को दर्शाता है। किसी भी विचारधारा से असहमति हो सकती है, लेकिन भाषा में मर्यादा और संवैधानिक पदों के प्रति सम्मान बना रहना चाहिए।
उर्वशी दत्त बाली ने कहा, “मैं गर्व महसूस करती हूं कि मैं श्री नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व वाले भारत की महिला हूं। मुझे इससे भी अधिक गर्व है कि मैं ऐसे युग में जन्मी हूं, जब भारत विश्व मंच पर अपनी नई पहचान बना रहा है। आज हमारी बेटियां सेना से लेकर विज्ञान, खेल, पुलिस, चिकित्सा और हर क्षेत्र में देश का नाम रोशन कर रही हैं।”
उन्होंने कुछ माता-पिता से अपील करते हुए कहा कि बेटियों को केवल स्कूल भेजना ही पर्याप्त नहीं है। उन्हें अपना समय, संवाद और संस्कार भी दीजिए। उन्हें सिखाइए कि मजबूत महिला वह नहीं जो किसी को अपमानित करके अपनी ताकत दिखाए, बल्कि वह है जो विपरीत परिस्थितियों में भी अपनी भाषा, व्यवहार और मर्यादा को बनाए रखे।
उर्वशी दत्त बाली ने कहा कि भारत की बेटियां देश की ताकत हैं। उन्हें शिक्षा के साथ संस्कार, अधिकारों के साथ जिम्मेदारी और आत्मविश्वास के साथ विनम्रता देना ही एक मजबूत और संस्कारी भारत की नींव है।

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